होली विशेष : चौथे स्तंभ का इरादा अडिग
आज “चौथे स्तंभ” का सम्मान दिवस है। वर्ष में दो बार ऐसा अवसर आता है, जब पत्रकार अपने पाठकों से केवल खबर पढ़ने की नहीं, बल्कि एक छोटे से सहयोग—एक विज्ञापन, एक शुभकामना संदेश, एक भरोसे—की अपेक्षा भी करता है। ताकि उसके घर का चूल्हा जलता रहे, बच्चों की पढ़ाई चलती रहे और जिम्मेदारियों की होली फीकी न पड़े।
होली का त्योहार है। शहर रंगों में सराबोर है। मंच सजे हैं, गुलाल उड़ रहा है, भाषण गूंज रहे हैं, कैमरों की फ्लैश चमक रही है। भीड़ तालियां बजा रही है, नारे लगा रही है।
लेकिन ज़रा ठहर कर सोचिए—अगर वहां पत्रकार ही न हो तो?
न कैमरा…न कलम…न सवाल…
क्या तब भी वही जोश रहेगा?
क्या वादों में वही सतर्कता रहेगी?
क्या जवाबदेही का वही एहसास होगा?
सच यह है कि भीड़ क्षणिक होती है, पर खबर स्थायी। नेता भाषण देते हैं, पर इतिहास हेडलाइन लिखता है। अधिकारी फाइलें बढ़ाते हैं, पर सुर्खियां जवाब मांगती हैं। क्योंकि सभी जानते हैं—कल की खबर ही आज का आईना है।
“चौथा स्तंभ”—शब्द बड़ा है, पर हकीकत सादा है। इस स्तंभ की नींव में न बड़ी तनख्वाहें हैं, न सुरक्षा कवच। यहां मेहनत है, जोखिम है, और समाज की संवेदना पर टिकी उम्मीद है।
त्योहार विशेषांक की तैयारी महीनों चलती है। प्रेस का हिसाब, लेखकों का मानदेय, हाकर का भुगतान, कागज की कीमत—सब जोड़ते-जोड़ते पत्रकार की जेब हल्की और जिम्मेदारी भारी हो जाती है। एक विज्ञापन के लिए कई बार दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं। और कभी-कभी पूरा भुगतान भी नहीं मिलता।
फिर भी आरोप तैयार रहता है—“बिक गया…”“फलां के पक्ष में लिख दिया…”पर सच्चाई यह है—जो बिकता है, उसका दाम तय होता है। यहां तो कई बार दाम भी अधूरा और सम्मान भी अधूरा होता है।
पत्रकार वही है जो भ्रष्टाचार की परतें खोलता है। वही है जो चुनावी वादों की पुरानी फाइल निकालकर पूछता है—“जनाब, ये आपने ही कहा था।”वही है जो सत्ता बदलते देखता है, पर सच नहीं बदलता।
विडंबना यह है कि समाज बदलाव चाहता है, पर बदलाव लिखने वाले की स्याही सूख जाए, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता।कल्पना कीजिए—अगर पत्रकार न हों तो?घोटाले फाइलों में ही दम तोड़ देंगे।वादे भाषणों में ही दफन हो जाएंगे।और जनता अफवाहों के सहारे सच तलाशती रह जाएगी।
चौथा स्तंभ कोई मसीहा नहीं है। वह भी इसी समाज का हिस्सा है। फर्क बस इतना है—वह जोखिम उठाकर सच सामने लाता है। उसकी एक खबर कई लोगों के लिए असुविधा हो सकती है, पर समाज के लिए आवश्यक होती है।
होली है—रंगों का पर्व।आप गुलाल लगाइए, मिठाइयां बांटिए, खुशियां मनाइए।हम भी रंग में भीगेंगे—पर कलम का रंग नहीं छोड़ेंगे।क्योंकि अगर कलम रुक गई, तो आईना धुंधला हो जाएगा।
इस होली बस इतना याद रखिए—विकास तभी संभव है जब हर स्तंभ अपनी जिम्मेदारी निभाए।नेता वादा निभाए, अधिकारी कर्तव्य निभाए, जनता सजग रहे…और पत्रकार सच लिखता रहे।
होली की हार्दिक शुभकामनाएं।रंगों के इस पर्व पर संवेदना और सहयोग का एक रंग चौथे स्तंभ के नाम भी लगाइए।
रज्जू बंजारे “वैभवी टाइम्स”
