बेमेतरा,जिले में अवैध धान, कालाबाजारी और अनियमितताओं के खिलाफ प्रशासन की सक्रियता देखने को मिल रही है। कोचिया स्थित गोदामों में छापेमारी, राइस मिलों की सघन जांच, धर-पकड़ कार्रवाई और हजारों कुंटल धान की जब्ती—ये सभी कदम प्रशासन की सख्ती को दर्शाते हैं। यह निश्चित ही सराहनीय है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सिर्फ चुनिंदा ठिकानों तक ही सीमित है?
अगर बात की जाए सेवा सहकारी समिति मर्यादित, परपोड़ी की, तो यहां तस्वीर बेहद चिंताजनक है। किसानों के अनुसार यहां रोजाना हजारों कुंटल धान की खुलेआम डकैती हो रही है। शासन का स्पष्ट आदेश है कि किसानों से 40 किलो 700 ग्राम प्रति बोरी धान लिया जाए, लेकिन परपोडी समिति में पदस्थ सहायक समिति प्रबंधक ने अपना अलग ही कानून बना लिया है।
किसानों का आरोप है कि उनसे प्रत्येक बोरी में 500 से 700 ग्राम अतिरिक्त तौल जबरन कराया जा रहा है। मजबूर किसान विरोध भी नहीं कर पा रहे, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं उनकी उपज की खरीदी ही न रोक दी जाए।
यह स्थिति कई गंभीर सवाल खड़े करती है—
क्या सेवा सहकारी समितियां प्रशासनिक कार्रवाई से ऊपर हैं?
क्या किसानों की मेहनत की फसल पर खुलेआम डाका डालने वालों को किसी का संरक्षण प्राप्त है?
आखिर जिले के जिम्मेदार अधिकारी इस ओर आंखें मूंदे क्यों बैठे हैं?
जब राइस मिलों और गोदामों पर कार्रवाई संभव है, तो सेवा सहकारी समितियों पर छापा कब?
कब होगी जवाबदेही तय और कब किसानों को मिलेगा उनका पूरा हक?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं—
क्या यह मामला भी कागजों में दब जाएगा या फिर दोषियों पर सख्त कार्रवाई होगी?
