रज्जू बंजारे
मकर संक्रांति वह पावन अवसर है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और इसी के साथ उत्तरायण की शुरुआत तथा खरमास का समापन होता है। यह पर्व मनुष्य को आशा, ऊर्जा, समता और जागरण का संदेश देता है।
सूर्य: समता का शाश्वत प्रतीकविश्व में यदि समता का सबसे सशक्त और शाश्वत प्रतीक कोई है तो वह सूर्य है। बिना किसी भेदभाव, जाति, वर्ग या राष्ट्र के, सूर्य समान भाव से सम्पूर्ण सृष्टि को ऊर्जा प्रदान करता है। भारतीय सनातन परंपरा में सूर्य केवल खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि जीवनदाता देवता हैं। सूर्य की उपासना प्रकृति संतुलन और जीवन दर्शन का आधार रही है।
वैज्ञानिक दृष्टि से मकर संक्रांति मकर संक्रांति पूर्णतः सूर्य की गति पर आधारित पर्व है, जबकि भारतीय पंचांग की अधिकांश तिथियाँ चंद्रमा पर आधारित होती हैं। पृथ्वी की धुरी लगभग 23.5 डिग्री झुकी हुई है, जिसके कारण ऋतु परिवर्तन होता है। उत्तरायण में सूर्य दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ता है, जिससे—दिन लंबे होने लगते हैं सूर्य की किरणें अधिक ऊर्जावान होती हैं ठंड का प्रभाव कम होता है प्रकृति में नवजीवन का संचार होता है
भारत उत्तरी गोलार्ध में स्थित होने के कारण उत्तरायण का यहाँ विशेष महत्व है।किसानों के श्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्वमकर संक्रांति मूलतः किसानों के परिश्रम, प्रकृति की कृपा और सूर्य की अनुकंपा का उत्सव है। इस समय तक देश के अधिकांश हिस्सों में खरीफ फसलों की कटाई पूर्ण हो जाती है। यही कारण है कि भारत के विभिन्न राज्यों में यह पर्व अलग-अलग नामों से मनाया जाता है—
उत्तर भारत – मकर संक्रांति, गुजरात-महाराष्ट्र – उत्तरायण ,तमिलनाडु – पोंगल, असम – माघ बिहू नाम भले अलग हों, लेकिन भाव एक ही है—कृतज्ञता, दान और संतुलन।
सनातन ग्रंथों में उत्तरायण की महिमा सनातन शास्त्रों में उत्तरायण को अत्यंत पुण्यकारी काल माना गया है। भगवद्गीता में इसे देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा गया है। मान्यता है कि उत्तरायण में देह त्याग करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। महाभारत में भीष्म पितामह ने इच्छामृत्यु का वरदान होते हुए भी उत्तरायण की प्रतीक्षा कर मकर संक्रांति के दिन देह त्याग कर इस विश्वास को अमर कर दिया।गंगा अवतरण और महास्नान का महत्व मकर संक्रांति का पर्व गंगा अवतरण से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इसी दिन माँ गंगा राजा भागीरथ के तप से प्रसन्न होकर सागर से मिली थीं। इसलिए गंगासागर और प्रयागराज में इस दिन महास्नान का विशेष धार्मिक महत्व है।
दान, तिल और खिचड़ी का वैज्ञानिक रहस्य कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन किया गया दान सौ गुना फल देता है। तिल, गुड़, अन्न, वस्त्र और जल का दान सामाजिक समरसता और करुणा को बढ़ाता है।सर्दी के मौसम में तिल शरीर को ऊष्मा और ऊर्जा प्रदान करता है। तिल से स्नान, तेल मालिश और हवन शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने गए हैं। वहीं चावल-दाल से बनी खिचड़ी पाचन को दुरुस्त रखती है, जबकि अदरक और सब्ज़ियाँ रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती हैं।
पतंगबाजी: परंपरा के पीछे छिपा स्वास्थ्य संदेश मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा केवल मनोरंजन नहीं है। यह लोगों को सुबह के सूर्यप्रकाश में समय बिताने का अवसर देती है। सूर्य की किरणें विटामिन-डी प्रदान करती हैं, जो हड्डियों, त्वचा और मानसिक प्रसन्नता के लिए आवश्यक है।जीवन को सही दिशा देने का पर्वजिस प्रकार भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में सभी को समान दृष्टि से देखा, उसी प्रकार सूर्य भी सबको समान ऊर्जा देकर यह संदेश देता है कि समता, करुणा और कर्तव्य ही सच्चा धर्म है।मकर संक्रांति केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर, जड़ता से गति की ओर और स्वार्थ से सेवा की ओर बढ़ने का संदेश है। उत्तरायण का सूर्य केवल दिशा नहीं बदलता, वह मानव चेतना को भी जागृत करता है।
